कोलाहल
मौन हूं मैं मन से लेकिन,
अंदर में कोलाहल है..
तुम खड़ी हो सामने,
फिर भी ये मन क्यों व्याकुल है..
चाहता है मन मेरा क्या,
किसकी इसको तलाश है..
गर अगर मिल जाए वो तो,
रहता फिर भी हताश क्यों..
क्यों नही होता है सब्र,
बढ़ती क्यों जाए चाहतें..
बावरा इस मन को ना,
मिलता कभी है शांति..
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