वक़्त पर कटाक्ष..
वक़्त पर कटाक्ष कर
गुज़र रहा जो समाज पर.!
तू क़लम आज़ाद है
लिख तो इस समाज पर.!
जो गलत है दिख रहा,
उस पर तू विचार कर.!
शब्दों में पिरो के तीर,
दुश्मनों पर वार कर.!
तू कलम आज़ाद है,
लिख तो इस समाज पर.!
शब्द से जुड़ेंगे शब्द,
काफ़िला बन जाएगा.!
तब समाज में नया,
आएगा बदलाव तब.!
तू कलम आज़ाद है,
लिख तो इस समाज पर.!
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