दहलीज़...

बेड़ियां समाज की,
पैरों में बंध गई है.!
संस्कार मिली है जो,
वो राह रोक रही है.!

मर्यादा की दीवारें,
है सामने खड़ी.!

कैसे करुं मैं पार,
दहलीज़ अपने घर की.?

खानदान की हूं इज़्जत,
कर पाऊंगी न पार.!
पगड़ी उतर जाएगी,
मेरे माँ-बाप के सर से.!

दहलीज़ के ही अंदर,
महफूज़ मेरी इज़्जत.!
गर कर गई मैं पार,
खाक़ हो जाएगी इज़्जत.!

इज्ज़त जुड़ी है मुझसे,
मैं हीं हूं घर की इज़्जत.!
मैं बेटी बन के जन्मी,
बेटा नही बन पाई.!
#अजय57 

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