बढ़ती आबादी...
आबादी ही निगल जाएगी,
देश के हर संसाधन को.!
अगली पीढ़ी को क्या हम देंगें,
सोंच ज़रा इन बातों को.!
देश के हर संसाधन को.!
अगली पीढ़ी को क्या हम देंगें,
सोंच ज़रा इन बातों को.!
आबादी हमने ही बढ़ाई,
हम ही इसके दोषी है.!
अपनी गलती थोप रहें है,
आनेवाली पीढ़ी पर.!
हम ही इसके दोषी है.!
अपनी गलती थोप रहें है,
आनेवाली पीढ़ी पर.!
संसाधन की हाल तो देखो,
कैसे इसको लूटा है.!
प्रकृति का दोहन करके,
चीरहरण कर डाली है.!
कैसे इसको लूटा है.!
प्रकृति का दोहन करके,
चीरहरण कर डाली है.!
घोल दी अमृत में विष है,
सांस कहां से पाएंगे.!
अपने हाथों ही अपने,
पैर पे मारी कुल्हाड़ी है.!
सांस कहां से पाएंगे.!
अपने हाथों ही अपने,
पैर पे मारी कुल्हाड़ी है.!
#अजय57

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